Sunday, 28 January 2018

चिड़िया

बहुत सर्दी थी कल रात
चिड़िया ठिठुरन से जम गयी
टटोलती रही कोई मकसूम तपिश ,एक मजबूत दामन
जो भर ले उसे छाती में
अपने देह की गर्मी से उसे महफूज़ कर दे 
पर ऐसा कुछ नहीं हुआ ,
रात भर गीले सपने डराते रहे
बहकाते रहे
रात भर बिछौने का कोना थामे कटकटाती रही
रात भर लगता रहा कि फकत आसमान छत है उसकी
कहीं दूर बज रहा था वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें
और उसे लगा की जिस्म लकडिया जाने तक ये गलन उसे नहीं छोड़ेगी
डर से उसने आँखें मूँद लीं
पर डर वो तो पुतलियों के बीच भी था
खो जाने का डर
मर जाने का डर ,
किसीने कहा था जब डर लगे गायत्री मन्त्र पढना
वो बुदबुदाने लगी ॐ भूर्भुवः स्वः
एक बार फिर ॐ भूर्भुवः स्वः
पर उसके आगे क्या था याद नहीं आ रहा
गलन रक्तप्रवाह पर हावी है शायद
गलन याददाश्त भी मिटा देती है शायद
मन्त्र अधूरा रहा डर बढ़ता रहा
सपनो की गलन हड्डी तक पहुँच गयी
देह चरमराने लगी
मुंह से थोड़ी थोड़ी भाप भी निकली
उसे लगा वो बरफ से भर गयी है ,
नीम बेहोशी में किसी का हाथ थामे वो मस्जिद जा रही है
खुश ,चहकती
अब हलकी हलकी नींद भी आ रही है
कोई उसे दुआ माँगना सीखा रहा है
नन्हीं नन्हीं हथेलियों में प्यार बरसा रहा है
फ्रॉक की जेबें मीठे बेरों से भर गयी हैं
अब गलन कुछ कम है ,
माथे पर एक बोसे की तपिश चमकी
माथा भर गया
एक बोसा मानो लिहाफ बन गया
तस्ल्लीकुं नींद का असबाब बन गया
अब नींद गहराने लगी चिड़िया मुस्कुराने लगी ,
और रात फिर एक चिड़िया इस तरह जिंदा बच सकी |

मन

रात में चुपके से भिगो देता है कोई
मन,
गिल्ली डंडे के खेल में माहिर थी
पर उस रोज पिट्ठू खेलते खेलते नज़र खो गयी 
अंतिम टुकड़ा मुट्ठी से नीचे गिर गया
नज़र खोयी हुयी है अब तक
सपनो में उस नज़र से पूरी गृहस्थी सजाई
सुन्दर सुन्दर रंगोली ,फूलों के गमले ,महावर ,नेल पोलिश तक
एक रोज बरम बाबा की मनौती भी मांगी ,
फिर जाना पड़ा दूसरे शहर
वहां भी गृहस्थी सजाई
सुन्दर सुन्दर रंगोली ,महावर, नेल पोलिश
इस बार गमले में कांटे वाले फूल उगाये
जब जब फूल खिला ,नेल पोलिश लगी ,महावर रचा
नज़र में रेत आ पडी
उसी पुराने शहर की रेत
सुना था पिट्ठू का वो आख़िरी टुकड़ा किसी तुलसी चौरे का तल है
बरम बाबा विचरते हैं शायद आस पास
असीस का जल लेकर |

खोटते चना

खोटते खोटते चना
खोट लेती हूँ मन का एक हिस्सा भी
लहसुन मिर्चे वाला नमक मिला
एक गस्सा जीभ पर धरते ही गज़ब का चटकारा लगता है
गज़ब लगता है फुनगी का बिछोह मिटटी से 
तर कर देता है कौले इश्क में टूटन के पहले सूखेपन को
उन क्षणों को भी
कि जब रात रात भर रजाई का एक कोना भिगोया
अपने ही चेहरे को परत दर परत नमक किया
हर कॉपी के पिछले पन्ने पर वो नाम लिख लिख मरी
बार बार हथेलियों पर बेंत की मार सही
अकेलेपन को ओढ़ खुद को ख़ाक किया
हर खुशी के उजाले को रात किया
वो सब तिर आया
मन के जल में तन के जंगल में ,
अन्दर से सांकल लगा जार जार रोई फिर बेआवाज़
दीवारें खुरचीं
ज़मीन लोट पोट की
अँधेरे का इंतज़ार किये बिना ही बत्ती बुझा
ताक पर सहेजी ढिबरी जलाई
उसकी गंध उसके धुएं को भरती रही छाती में
सुख का दुःख और दुःख का सुख करती रही छाती में
अज़ब घालमेल कि तब थोड़ी आग भभकी और बह गयी पोर पोर से ,
सखियों संग अब जांता पीसने की बारी
खाली गेहूं नहीं उसकी बालियाँ भी पीसती हूँ
खुद को उससे एकमेक कर अलट पलट कर देती हूँ
अपने नहीं उसके होने को कोसती हूँ
अपना भुला उसका दुःख पोसती हूँ ,
कि ये दुःख ही है जो अल्हड इश्क का पहला जाया होता है ||

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति की पतंगें
अखबार और लेई से बनी पतंगें
सींक के परफेक्ट घुमाव पर चिपकी पतंगें
हवा का रुख भांप लम्बी सी पूँछ लिए लहराती पतंगें
लिख दिया करती थीं प्रेम का आख्यान आसमान में 
प्रेम जहां अंगडाइयां लेता तिल के लड्डू हथेलियों में सरकाता
गुड पट्टी पर नाखूनों की खरोंच से एक नाम लिखता
और जहाँ एक का लिखा नाम दुसरे के लिखे नाम को चूम लेता
वही होता कि जब बिना कुछ कहे बिना सुने वो हो जाता
और कहीं झुण्ड में बैठे ठहाका लगाकर बड़े कहते
खिचडी के चार यार
घी पापड़ दही अचार ,
इसी वक्त से शुरू होती थी डायरियों की खोज बीन
लिखी जातीं थीं अनगढ़ कच्ची कवितायें और नए नवेले प्रेम का पूरा खाका
विरहन आंसुओं और मीठे मीठे सिहरन वाले दर्द की पूरी तफसील
उन्हें आलमारी में छुपा छुपाकर रखने का सिलसिला
और प्रेम के आदर्शवाद का गहन गंभीर भाव ,
और फिर एक रोज कुछ यूँ होता
कि रफ़ी के गानों की जगह मुकेश के गाने बजने लगते
कभी ये भी सुनाई पड़ता
जब दिल ही टूट गया या फिर मेरी किस्मत में तू नहीं शायद
और तब डायरी में लिखे अलफ़ाज़ गमजदा व् परिपक्व होने लगते
कवितायेँ अब पक चुकी सी होतीं
व्यक्तित्व संजीदा होता
चेहरे भी कुछ गाम्भीर्य लिए से दिखते ,
पर ये कमबख्त मकर संक्रांति की पतंगे
एक बार फिर आसमान में लहरातीं
फिर तिल के लड्डू और गुड पट्टियाँ खाई जातीं
झुण्ड में बैठे बड़े भी ठहाका लगाते और कहते कि खिचडी के चार यार
घी पापड़ दही अचार
पर जो नहीं होता वो ये कि इस बार उन पतंगों पर कोई नाम नहीं होता
दिल में कच्चे इश्क का कोई तूफ़ान नहीं होता
नहीं होतीं गुड पट्टियों पर तराशे हुए नाखूनों की कोई खुरचन
न ही चेहरे पर प्रेम का एक किस्म का मादक रुआब ,
डायरियों में अब लिखे जा रहे होते अनगढ़ से कुछ विरह गीत
रखे होते फटी पतंग के कुछ पुराने छोटे छोटे टुकड़े
खुशबूदार इतर से गमकती एक चिट्ठी
किसी और के बगीचे से तोडी गयी नन्हें गुलाब की एक कटिंग
अतिउत्साह में खून से लिखा किसी का नाम
और उस पर बिखरी ढेरों आंसुओं की बूँदें ,
मकर संक्रांतियों के पतंग चेतावनी हैं
प्रेम के मीठेपन
और दर्द के खारेपन की ,
ओ प्पा |

दुःख

दुःख
इस संसार का सबसे जगमग सितारा है
रात का सबसे भरोसेमंद साथी
दुःख अकेला नहीं छोड़ता
सर्वाधिक सुख में भी 
उसकी एक कनी आँखों में उतर ही आती है
उसका एक बगूला छाती को भर ही देता है ,
दुःख
आत्मा की ज़मीनों पर बोई जाने वाली सबसे उपजाऊ फसल है
लम्हों के हलों की जुताई की पीड़ात्मक जरूरत
दुःख सर्वांगी विकास का पोषक है
दुःख प्रेम का द्योतक है
ईश्वर रच देता है यहाँ खुद को
प्रकृति झोंक देती है यहाँ खुद को
आसान नहीं दुखों का प्रतिनिधि होना ,
दुःख
मौसमों की सबसे बड़ी शिकायत है
उनका सबसे बड़ा उलाहना
कि इस एक वक्त भीतर का एकांत बदल जाता है
दहल जाता है
हर मौसम जाते हुए अपना एक अंश समर्पित कर देता है
आत्मा कभी ठण्ड ,कभी गर्मी तो कभी बारिश हो जाती है बेहद
अनगिनत परकोटो के भीतर
सबका अलग अलग जुड़ाव ,सार संभाल भी
कि दुःख सबसे ज्यादा सहेजे जाने वाला भाव है
कि दुःख आत्मा का घाव है
कि दुःख परछाई है किसी की
कि दुःख काई है नदी की ,
दुखों का होना जरूरी है
कि नहीं अगर
तो साँसों का सिलसिला चलेगा कैसे
ईश्वर का होना बचेगा कैसे |

दो प्रेमी

पर्वत के पीछे चम्बेला गाँव
गाँव में दो प्रेमी रहते हैं
बचपन से लगता कि ये गाना सिर्फ हमारे लिए है
गुदगुदी होती पेट में कि हाय किसी और को कैसे पता 
पर फिर लगता उंह
सपने में किसी रोज़ किसी फ़रिश्ते ने सुना होगा
और लिख दिया होगा
तब मुझे नहीं पता था कि फ़रिश्ते कौन होते हैं
क्यों होते हैं बस होते हैं इतना पता था
ये भी सुना था कि फ़रिश्ते अच्छा अच्छा ही करते हैं
मन की करते हैं
तब नहीं पता था कि उस फ़रिश्ते का नाम आनंद बख्शी था
और ये गीत मेरे पैदा होने के चार साल में ही लिख दिया गया था
तो क्या फ़रिश्ते ज्योतिषी भी होते हैं
हमें तो लगता इन दूर तक फैली कैमूर घाटियों के पीछे ही है वो गाँव
वो मधुर राग सा
वो पहली आग सा
पहली छुअन सा
बांसुरी की धुन सा एक अकेला गाँव
दुकेला इस तरफ था
झरिया के पास चट्टानों पर बैठे
कभी चाय कभी अमरुद और कुछ न हो तो नमक खटाई और लाल मिर्च चुभलाते
कभी लम्बे से झरने के नीचे तक गिरते शोर के साथ अपलक टकटकी लगाये देखते हम उस सुन्दर देवनुमा पहाडी को
सोचते जरूर कोई होगा वहां पर अकेला
दुकेले तो हम थे
मन ही मन न जाने कितनी बार जोर से आवाज़ लगाई है उस अनजान प्रेमी के लिए
कितनी बार चेहरे के गुलाबी होने, होठों के सूख जाने और हाथ पैर के ठन्डे होने तक पुकारते रहे हैं उसका नाम
जो हमें नहीं पता था
जो अनजान था
पर जो प्रेमी था ,
प्रेम के सातों सुर उस पहाडी के पीछे थे
जहाँ बहती थी सोन नदी
जहाँ के एक घर में रहती थी एक मोहाविष्ट लडकी
जहाँ के जंगल मोहक थे
जहाँ पर लिल्ली घोड़ों के झुण्ड के झुण्ड नज़र आते थे
और जहाँ नज़र आता था बहुतायत से लाल मखमली कीड़ा बीरबहूटी
अपनी हथेलियों पर उसे धर उसके नन्हें नन्हें कदमो कि गति से प्रेम की पहली सिहरन महसूस करते हम
छोटी छोटी चट्टानों. पर , दरारों में उग आये पीपल के छोटे पौधों में भी प्रेम महसूस करते हम
कोहरे की अभेद्य दीवार के पीछे मन में टिमटिमाते दिए की रौशनी में भी प्रेम महसूस करते हम ,
हम जो कि एक छोटी जगह की पैदाइश थे
कि हमारे सपने भी हमारी जिन्दगी की आज़माइश थे
कि हम तुरपनों में सीख लेते थे खुद को छुपाना
कि हम रसोई से सीखते थे मिलना मिलाना
कि हमारी कापियों के पिछले पन्ने हमारी रचनात्मकता थे
कि वहां बार बार आड़ी तिरछी रेखाओं में छुपे अक्षर हमारी सजगता थे
हम प्रेम छुपकर करते थे
हम दुःख खुलकर जीते थे ,
आज भी बजता है ये गीत रेडियो पर
अब भी लगता है कि ये हमारे लिए है
पर्वत के पीछे चम्बेला गाँव
गाँव में दो प्रेमी रहते हैं
पर अब हम प्रेम को साधना जानते हैं
जानते हैं कि वहां सच में दो प्रेमी रहते हैं
साथ साथ ,
तमाम सीखों समझदारियो को धता बताकर हम प्रेम अब भी जीते हैं
बूँद बूँद दर्द हर रोज़ पीते हैं
हर एकांत में हम उन्हें शोभा गुर्टू बना लेते हैं
याद पिया की आये
या फिर जगजीत सिंह
चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कभी कभी कुमार विश्वास भी
कि फिर मेरी याद आ रही होगी
फिर वो दीपक बुझा रही होगी
और इस तरह हम तकियों को छाती में भींचे नींद का बहाना करते करते एक और रात गुजार देते हैं
प्रेम को कुछ और सहेज हम थोडा सा सो पाते हैं |

Tuesday, 16 January 2018

कविता

१-मैं धूप के पन्नों पर इक नज्म लिखना चाहती हूँ
नज्म वो
कि जिसमें तपिश के तीव्र पीङादायी झोंकों के
सागर हों 
विकलताओं की वेदना का खारापन हो
और जो संवर सके शैवालों सीपियों व रंगीन पत्थरों के
टूटे आँसुओं से,
नज्म वो भी
जिसमें गूंजता हो जंगल का सौम्य हाहाकार
कि जिसमें तैरती हों ढेरों मछलियां बिलबिलाई सी
और जिसमें हवाओं पर जलकुंभियों का भीषण प्रतिबंध हो
और हो ढेरों कण उदासियों के छितराये हुए,
इस नज्म को ढालकर सुरों में इकतारे पर रच दूँगी
कस दूँगी
फिर सौंप दूँगी उस एक अदभुत नायिका को
जो जीवंत कर सके इसकी आत्मा नाट्य गृहों के मंच पर
प्रस्तुत कर सके इसे अदम्य यातना के सफल मनोहारी चित्र सा
कि जिसे उकेरा जा सके वहां की खाली सूनी उपेक्षित दीवारों पर
या फिर दर्शक दीर्घा में बैठे अनगिनत कसमसाते हृदयों पर
युगों -युगों तक के लिए।।


2-